बिजली जाने पर लोग छत पर सोया करते थे.
बिस्तर से ऊपर देखो, तो दूर-दूर तक सिर्फ बड़े बड़े बादल,
गहरी काली रात, चमकते तारे और चाँद.
ठंडी हवा के झोंके, जो हलके से छू कर चले जाते,
दूर से धीमी गहरी वाहनों की आवाज़ें
और भीतर झींगरों का सायरन.
इसी बीच मन सोचने लगता,
इस विशालकाय आसमान के नीचे हम हमेशा से सोते आये हैं,
मगर समय बीतते हम इनका आनंद लेना भूल गए हैं,
सांस लेना भूल गए हैं.
कुदरत की इन अमूल्य सुन्दरताओं के आनंदों को छोड़
सांसारिक आनंदों में घुलते जा रहे हैं.
क्यों ना फिर मुड़ें,
फिर चलें,
फिर चलें,
और खुला छोड़ दें उस अन्दर छिपे बच्चे को,
जो बरसातों से गीली मिटटी की खुशबू सूंघना चाहता है
जो गड्ढों में भरे पानी में कूदना चाहता है
जो टपकते बर्फ के ओलों को अपनी कटोरी में समेट, खुश हो जाता है
जो उन मचलती हवा की ठिठोलियों में सोना चाहता है
जो खो कर भी पाना चाहता है,
जो जीना चाहता है!
